अगर मैं दहेज लूँगा तो मैं रसूल के मंच से कैसे बोलूँगा?
Dabang Sahafat••0 व्यूज़•5 मिनट पढ़ें
डबंग न्यूज़ ब्यूरो
जैसे ही मैं लूँगा, मैं मीनबरी रसूल से कैसे बोलूँगा?
ऐसे पवित्र विचारों वाले विद्वान आज भी मौजूद हैं जो हिंदू-सम्बन्धी अनुष्ठानों वाली शादियों से घृणा करते दिखाई देते हैं। ये सज्जन केवल मीनबरी रसूल ﷺ से शादी-तलाक की अनावश्यक रस्मों पर शब्दिक आलोचना नहीं करते, बल्कि व्यावहारिक रूप से उदाहरण प्रस्तुत करते हुए सुन्नत और शरिया के सीध रास्ते पर चलने की मार्गदर्शन भी देते हैं। उनके शब्द और कर्म, कार्य और चरित्र से इमाम-रसूल ﷺ की आत्मा को सुकून देने वाली खुशबू साफ़ और स्पष्ट रूप से महसूस होती है।
आज के इस परफ़तन दौर में, जब बेटी की शादी करना सबसे कठिन काम बन गया हो और हर व्यक्ति अपनी बहन या बेटी की मंगनी और शादी के समय चार पाँच लाख रुपये खर्च करने पर मजबूर हो गया हो, तो ऐसे परिस्थितियों में हमारे किसी अलम-ए-दीन का इतनी गंभीर राशि को इसीलिए ठोकर मार देना कि हमारे प्यारे नबी करीम ﷺ की सादगी वाली निकाह की सुन्नत को ज़िंदा करना है और जनता के सामने व्यावहारिक उदाहरण पेश करना है, सोचें कि ऐसी चुनी हुई व्यक्तित्व के विचार और सोच कितनी ऊँची और श्रेष्ठ होंगी, उनके दिल में अपनी जनता से प्यार कितनी अधिक होगी। कि वह समाज में फैली हुई शादी की वैबिक मिथ्या को देखकर माही़ बे-आब की तरह तड़पते होंगे।
उनकी हुस्न-ए-सिरत, समझ और बुद्धि का आकलन तो लगाइए!! यह किस हद तक गहराई से सोचते और फिर उस पर अमल करके दिखाते हैं कि हमारे समाज में शादी के मौके पर जो हिंदू-सम्बन्धी रस्में दारी हैं, उनका क़ल्प-नाश करने में हमें अपनी खुद से पहल करनी चाहिए। वास्तव में यह काम आसान नहीं है, लेकिन जिसको अल्लाह तफ़ीक़ दे दें, उसके लिए मुश्किल भी नहीं है।
तो दोस्तों!! आइए, आज मैं आप सज्जनों के सामने एक ऐसे अलम-ए-दीन की शादी की वास्तविक कहानी बताने जा रहा हूँ, जिन्होंने अपने कर्म से सादगी वाली निकाह करके दिखाया है।
मई सन 2025 की बात है। राक़िम अल-हुरुफ़ को अपनी बेटी के लिए रिश्ते की तलाश थी। हमारे परिवार में अलम और हिफाज़ को प्राथमिकता दी जाती है, नहीं तो कम से कम वज़न और आकृति में ही उनके समान हों। फिर भी, मेरे फ़रज़़-द-एर्ज़मंद मोहम्मद साद सलमा ने कहा कि मोलाना रिहान अहमद साहब कासमी के बारे में क्या राय है?
मोलाना के संबंध में मुझे पहले से ही पता था, क्योंकि वे हमारे गुरु-परम मान्य क़ारी अब्दुलरब साहब के शिष्य हैं। इस कारण वे इब्न-ए-क़ैदिम की सभा में भाग भी ले चुके थे और दो तीन माह हमारे مدرسे के गुरु भी रहे थे। इसीलिए उनके इत्यादि और आदतें, आचरण और चरित्र, बोलचाल और व्यवहार, रहन-सहन, बैठक और बर्खास्त, मामलों और सामान्यताओं और जीवन के शब और रोज से यह छोटा आदमी अच्छी तरह अवगत था।
सुफ़ी-आना खानक़ाही मिजाज़, दावत और तबलीग से प्रेम, शिक्षकों का ادب और सम्मान, मीनबरी की ज़ीनेट बनें तो शेरिन व परतासीर बयान, इमामत के पद पर फासिल हों तो ख़ुश हानी से कुरआन-ए-पाक की तلاوت, और सामूहिक दुआ के लिए हाथ उठाएँ तो सबकी आंखें नम हो जाएँ। एक हफ़ाज़ कुरआन और अलम-ए-दीन में जो गुण होने चाहिए, वह अल्लाह पवित्र ने मोलाना रिहान अहमद साहब को अदा किया है। यही धार्मिक और वैज्ञानिक खूबियाँ थीं जिनकी वजह से इस छोटा आदमी के दिल से आवाज़ निकली कि यह रिश्ता उपयुक्त है।
अब चिंता हुई कि बात को आगे कैसे बढ़ाया जाए। चنانु क़ारी अब्दुलरब साहब को बीच में लाकर चर्चा का सिलसिला शुरू हुआ। मोलाना के पिता-परम मान्य भी नेक सूरत, धर्मदार, खुददार, ब़ा-आलख़, गंभीर मिजाज़, ब़ा-उक़ार, चेहरे पर सुन्नत सजाए हुए, अल्लाह वालों का पोशाक ज़ीब-ए-तन करके और दरविश सिफ़त व्यक्तित्व के मालिक हैं। उनसे बात हुई तो उन्होंने कहा कि क़ारी साहब आए हुए हैं तो हमारी तरफ़ से पका समझें।
यहाँ पर मैंने कहा कि नहीं, लड़की को एक बार आप सज्जनों आकर देख लें। फिर भी तारीख तय हो गई, लेकिन उनकी एक शर्त थी कि खाने का कोई इंतजाम न करें। हमने कहा कि ठीक है।
हमने अपने चाचा जॉन, मोलाना मोहम्मद नसीम साहब कासमी दमात बरकतहम, इमाम और गुरु दार-ए-इल्म कासमीया, जो मुंबई में मेरे सबसे बड़े ख़ैर ख़्वाह हैं और जिन्हें मैं वडिल-ए-ग्रामी की नजर से देखता हूँ, सबसे पहले उनसे सलाह ली। उन्होंने कहा कि बहुत बेहतर है।
इधर मोलाना रिहान साहब ने अपने पेर व मर्शद हज़रत मोलाना मोहम्मद याही साहब नुश्क़बंदी दमात बरकतहम से सलाह की। हज़रत से हमारी अभी तक कोई पहचान नहीं थी, लेकिन उस समय हज़रत ने उनसे कहा: बस्ती के लोग अच्छे होते हैं, आप रिश्ता कर लें।
जिस तरह से हज़रत पेर-ए-तरीक़, रहबर-ए-शरिया, इब्तदात-ए-सुन्नत में सरशार दिखते हैं। उसी तरह से अल्लाह पवित्र ने आप को विस्तृत ज्ञान और कर्म, बुद्धि और दान, समझ और बुद्धि, हिकमत और दानाई, उलझी हुई ग़थ को सुलझाने और सलाह की गहराई तक पहुँच कर संतोषजनक नसीहत करने का बेमिसाल जौहर अदा किया है। अल्लाह पवित्र आपकी उम्र दारज़ करे।
बहरहाल, दोनों पक्ष के राय और सलाह से यही बात सामने आई कि रिश्ता उपयुक्त रहेगा। बात यहाँ तक पहुँच गई, लेकिन मैंने अब तक मोलाना का घर नहीं देखा था और न ही देखने की कोई जरूरत महसूस हुई, क्योंकि मुझे पता था कि एक अलम-ए-दीन की पत्नी बच्चे, अल्हमदुलिल्लाह, शांति भरी ज़िंदगी जीते हैं।
अभी तक लड़की को देखने का कार्य बाकी था। चنانु तय तारीख पर मोलाना के माता-पिता आए और उनकी माँ ने मेरी बेटी के हाथ में रुपया दे दिया। इसका मतलब हमारे यहाँ यह निकलता है कि रिश्ता पसंद आ गया है। हम लोगों ने भी लगे हाथों शरबती आदि दे दी, लेकिन इसमें खर्चे नहीं के बराबर हुआ।
इसके बाद 23 अप्रैल सन 2025 को हज़रत की खानक़ाह में निकाह की परमसर्त कार्यक्रम आयोजित हुई। हज़रत ने ही निकाह पढ़ाया। वहीं हज़रत के तरफ़ से मेहमानों के लिए चाय नाश्ता का इंतजाम भी किया गया था।
सच में यह है कि मेरी बेटी को इतना बेहतर रिश्ता मिला और इतनी सादगी के साथ शादी हो गई। इसमें बहुत से ख़ैर ख़्वाहों की दुआएँ शामिल थीं, लेकिन ह…